सैनिक ठाकुर हनुमान सिंह - स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ का योगदान

सैनिक ठाकुर हनुमान सिंह - स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ का योगदान 


वीरनारायण की शहादत ने ब्रिटिश शासन में कार्य कर रहे सैनिक हनुमान सिंह में विद्रोह का भाव जगा दिया।
नारायण सिंह के बलिदान स्थल पर इन अमर बलिदानियों के नेता हनुमान सिंह ने नारायण सिंह को  फाँसी पर लटकाए जाने का बदला लेने की प्रतिज्ञा की।
  • रायपुर में उस समय फौजी छावनी थी जिसे तृतीय रेगुलर रेजीमेंट का नाम दिया गया था। ठाकुर हनुमान सिंह इसी फौज में मैग्जीन लश्कर के पद पर नियुक्त थे।  सन् 1857 में उनकी आयु 35 वर्ष की थी।  विदेशी हुकूमत के प्रति घृणा और गुस्सा था।
  •  रायपुर में तृतीय रेजीमेंट का फौजी अफसर था सार्जेंट मेजर सिडवेल। दिनांक 18 जनवरी 1858 को रात्रि 7:30 बजे हनुमान सिंह अपने साथ दो सैनिकों को लेकर सिडवेल के बंगले में घुस गये और तलवार से सिडवेल पर घातक प्रहार किये। सिडवेल वहीं ढेर हो गया।
  •  हनुमान सिंह तोपखाने के सिपाही और कुछ अन्य सिपाही भी आये। उन्हीं को लेकर वह आयुधशाला की ओर बढ़ा और उसकी रक्षा में नियुक्त हवलदार से चाबी छीन ली। बंदुको में कारतूस भरे। दुर्भाग्यवश फौज के सभी सिपाही उसके आवाहन पर आगे नहीं आये। इसी बीच सिडवेल की हत्या का समाचार पूरी छावनी में फैल चुका था। लेफ्टि, रैवट और लेफ्टि, सी.एच.एच. लूसी स्थिति पर काबू पाने के लिये प्रयत्न करने लगे। हनुमान सिंह और उसके साथियों को चारों ओर से घेर लिया गया।
  • हनुमान सिंह और उसके साथ छ: घंटों तक अंग्रेजों से लोहा लेते रहे। किन्तु धीरे-धीरे उनके कारतूस समाप्त हो गये। अवसर पाकर हनुमान सिंह फरार होने में सफल हो गये। किन्तु उनके 17 साथियों को अंग्रजों ने गिरफ्तार कर लिया।

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