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पंडवानी नाट्य - छत्तीसगढ़ का लोक नाट्य

पंडवानी नाट्य - छत्तीसगढ़ का लोक नाट्य 


पंडवानी -

छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में पंडवानी, नाचा, और रहस नाट्य रूप विद्यमान हैं। पंडवानी शब्द पांडव वाणी अर्थात पांडव कथा से बना है। पंडवानी का वर्तमान स्वरूप धीरे-धीरे कई दौर की यात्रा के पश्चात विकसित हुआ है आरम्भ में पंडवानी गोंड परधानों द्वारा गई जाने वाली एक लम्बी गाथा के रूप में प्रचलित थी। 

गोंड प्रधान गोंड जनजाति के भात या या मीरासियों के सामान ही एक जाति है जो कभी गोंड जन जाति का ही अंग रही होगी। परधान गाथा गायक,  तीन प्रमुख गाथाएँ गाते हैं: पंडवानी, गोंडवानी, रामायणी। एक अन्य गाथा कराम्सिनी का भी उल्लेख मिलता है, परन्तु वह गाथा विलुप्त हो गयी है। करमा की कथा,  करमा नृत्य एवं गीत तो बचे हुए हैं, परन्तु गाथा विलुप्त हो चुकी है।

 पंडवानी में पांडव कथा अर्थात महाभारत की कथा, रामायणी में रामायण की कथा और गोंडवानी में गोंड राजाओं एवं उनके पूर्वजों की कथा समाविष्ट है। परधान इन गाथाओं को सारंगी बजा कर गाते थे। फसल कट कर कोठार में पहुँचने के बाद दूर दूर तक फैले अपने जजमानो के यहाँ लंबी यात्राओं पर निकलते हैं। गाथाएँ गा कर एवं अपनी वंशावली का बखान करके वे अपने जजमानों से भेंट में अन्न वस्त्र एवं नकद धन राशि प्राप्त करते हैं।

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